एक किसान भक्त की सच्ची आस्था और भगवान श्रीराम की दिव्य सहायता की यह कहानी आपको रामनवमी के शुभ अवसर पर भक्ति, विश्वास और करुणा का सच्चा अर्थ सिखाएगी।
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"श्रीराम की कृपा"
(एक भक्त की सच्ची आस्था की कहानी –)
बहुत समय पहले की बात है। उत्तर भारत के एक छोटे-से गांव “शिवपुर” में रामभक्त रघुवीर नाम का एक व्यक्ति रहता था। रघुवीर साधारण किसान था, पर उसकी भक्ति असाधारण थी। हर दिन वह सूर्योदय से पहले उठता, स्नान कर श्रीराम की पूजा करता, और खेत में काम करने से पहले रामायण का पाठ करता। उसका एक ही विश्वास था – “जो राम का है, उसे कोई कष्ट छू नहीं सकता।”
रघुवीर का जीवन कठिनाइयों से भरा था। उसके पास जमीन बहुत कम थी, घर की हालत भी जर्जर थी, और परिवार में पत्नी के अलावा दो छोटे बच्चे थे। फिर भी, उसके चेहरे पर कभी चिंता की रेखा नहीं दिखती थी। जब कोई पूछता, “तुम इतनी परेशानियों में भी मुस्कुराते कैसे हो?” वह शांत भाव से कहता, “श्रीराम देख रहे हैं, वे सब ठीक कर देंगे।”
समय बीतता गया। एक साल सूखा पड़ गया। खेतों में फसल नहीं हुई, तालाब सूख गए, और गाँव के कई लोग शहर की ओर पलायन करने लगे। रघुवीर के घर में भी अनाज की कमी हो गई। बच्चे भूखे सोने लगे। पत्नी ने एक दिन कहा, “रघुवीर, अब भगवान भी हमारी सुनते नहीं लगते। कुछ काम-धंधा शहर में देखो।” रघुवीर ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “आज रामनवमी है, भगवान राम का जन्मदिवस। वे अपने भक्तों को इस दिन खाली हाथ नहीं लौटाते। देखना, कुछ न कुछ होगा।”
पत्नी ने खिन्न होकर कहा, “कहीं चमत्कार की उम्मीद मत करो।” मगर रघुवीर ने जैसे मान लिया था कि आज श्रीराम कुछ करेंगे।
उसने पूजा की थाली सजाई, तुलसी-दल रखा, दीप जलाया, और अपने टूटे-फूटे घर के मंदिर में बैठ गया। आँखें बंद कीं और श्रद्धा से रामनाम जपने लगा। बाहर गर्मी थी, लेकिन उसके अंदर एक शीतल शांति थी।
इसी दौरान, गाँव से कुछ दूरी पर एक बड़ा जमींदार, ठाकुर दयाल सिंह, अपने कारिंदों के साथ आ रहा था। ठाकुर जी के बैलगाड़ी का पहिया एक दलदल में फँस गया। कारिंदे कई कोशिशों के बाद भी गाड़ी को निकाल नहीं पाए। तभी एक राहगीर ने कहा, “शिवपुर में एक रघुवीर नाम का भक्त रहता है। कहते हैं उसके राम में इतनी आस्था है कि वह जो चाहे, हो जाए। उसकी मदद लो।”
ठाकुर पहले हँसा, “भक्त की क्या मदद?” लेकिन फिर कोशिश के बाद थककर उसी गाँव की ओर चला।
जब वह रघुवीर के पास पहुँचा, रघुवीर भजन में मग्न था। कारिंदों ने आवाज़ लगाई। रघुवीर बाहर आया। ठाकुर ने पूरी बात बताई और कहा, “अगर तुम मेरी गाड़ी निकलवा दोगे, तो मैं तुम्हें इनाम दूँगा।” रघुवीर ने विनम्रता से कहा, “मैं तो कुछ नहीं, प्रभु राम ही सब करते हैं। चलिए, देखते हैं।”
रघुवीर ने जाकर गाड़ी देखी, दलदल बहुत गहरा था। उसने आँख बंद की, राम नाम का स्मरण किया, और फिर अपने कंधे से हल्का-सा धक्का दिया। और आश्चर्य! जो गाड़ी आठ लोगों से नहीं निकली, वह एक धक्के में बाहर आ गई। सब हैरान रह गए। ठाकुर की आँखों में श्रद्धा आ गई। उसने पूछा, “तुमने ये कैसे किया?” रघुवीर मुस्कुरा कर बोला, “मैंने नहीं किया, राम ने किया।”
ठाकुर बहुत प्रभावित हुआ। उसने रघुवीर से कहा, “मैं तुम्हें अपने खेतों का एक टुकड़ा देना चाहता हूँ। वहाँ उपजाऊ जमीन है। तुम्हारे जैसे ईमानदार और धार्मिक व्यक्ति के हाथों में वो जमीन सुरक्षित रहेगी।”
रघुवीर ने विनम्रता से मना किया, “मुझे कुछ नहीं चाहिए ठाकुर साहब। जो कुछ भी मिला है, वह प्रभु की कृपा है।” लेकिन ठाकुर ने ज़ोर देकर कहा, “इससे राम भी प्रसन्न होंगे कि उनका भक्त सुखी है।” आखिरकार, रघुवीर ने केवल उतनी जमीन ली जितनी वह जोत सकता था।
कुछ ही महीनों में उस जमीन पर अच्छी फसल हुई। रघुवीर का घर फिर से हँसी से भर गया। अब वह न केवल अपने परिवार का पेट भर सकता था, बल्कि जरूरतमंदों की मदद भी करता था। उसने गाँव के मंदिर की मरम्मत करवाई, और हर रामनवमी पर भव्य आयोजन शुरू किया।
लोगों ने उससे पूछा, “राम ने तुम्हें क्यों चुना?” रघुवीर ने जवाब दिया, “क्योंकि मैंने उन्हें चुना। जब सभी ने उनका साथ छोड़ा, मैंने उन्हें नहीं छोड़ा। वे मेरे अपने हैं, और अपने कभी छोड़ते नहीं।”
सीख:
यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्ची श्रद्धा और धैर्य कभी व्यर्थ नहीं जाते। रामनवमी केवल एक पर्व नहीं, बल्कि यह याद दिलाने का दिन है कि भगवान अपने भक्तों की परीक्षा लेते हैं, लेकिन अंत में उनकी सहायता अवश्य करते हैं। रघुवीर की तरह अगर हमारी आस्था अडिग हो, तो प्रभु श्रीराम हमारे जीवन की गाड़ी भी दलदल से बाहर निकाल देंगे।
जय श्री राम जय जय श्री राम
